First love Part -2

दीदी बोली देर से उठने की आदत गई नहीं तेरी, मैं मुस्कुरा दिया। तब तक मां मेरे पास आकर बोली बेटा एक बार अपना सामान चेक कर लो कुछ छूट ना जाए और रास्ते में खाना टाइम से खा लेना पैक कर दिया है, और फोन मत चलाना स्विच ऑफ हो जाएगा तो मुझे चिंता होगी और सामान पर ध्यान रखना ट्रेन में चोरी भी होता है, एक सांस में बोली जा रही थी मैंने उन्हें रोकते हुए बोला मां चिंता मत करो मैं ध्यान रखूंगा। तैयार होने चला गया। घर से निकते समय मां, चाचा, दीदी, छोटे भाई सब से मिलकर भावुक हो गया था। और अपने आंसू छुपाने के लिए सनग्लास लगा ली थी।

मैं गाड़ी में बैठ चुका था और पीछे मुड़कर देखा मां रो रही थी। मैं भी रो पड़ता अगर थोड़ी देर और रुक जाते। मैं जब अदिति के घर के सामने से गुजर रहा था तो आदिति छत पर खड़ी मुझे देख रही थी मैं उसे एकटक देखे जा रहा था जिसे आखिरी बार देख रहा हूं।प्यार की खूबसूरती और अहमियत दोनों ही प्यार की गैरमौजूदगी में ज्यादा बेहतर पता लगती है, तब हर दर्द का एक ही नाम होता है ,एक ही वजह होती है “याद”।दिन ढलते ही दिल भारी सा होने लगता है और रातें अजीब सा अकेलापन लिए हुए हमें खुद में समेट लेना चाहती है।

किसी को चारों तरफ ढूंढती हुई हमारी आंखें किसी के पूछ भर लेने से छलक पड़ती। दिल्ली में मेरे साथ यही हो रहा था। इस दुनिया में हम पापी नकारे लोगों ने जितनी भी लते इजात की है उसमें से सब से खराब लत है प्यार। इस बात को गांठ बांध लीजिए।
खैर अब हर साम फोन पे बात होने लगी थी। किसी तरह 6 बित गए। कुछ दिनों में घर जाने वाला था। घर जाने के खयाल से ही में खूश रहने लगा था। दिल्ली में मेरे कई दोस्त बन गए थे।जिनमें से एक थी अंशु। अंशु और मैं classmate थे।एक दिन अंशु ने मेरे साथ ली हुई picture Facebook पे  upload की ओर caption  मे लिखा partners for ever.

अदिति को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया।मैंने उसे समझाया कि मै और अंशु सिर्फ दोस्त है,लेकिन वो समझ ही नहीं रही थी।मुझे भी गुस्सा आया और हमदोनो में काफी बहस हुई।इन सब में मैंने घर आने वाली बात नहीं बताई।एक दिन बाद मुझे sorry massage किया लेकिन कोई रिप्लाई नहीं किया। उसने मुझे काफी फोन भी किया लेकिन मैंने एक बार भी उससे बात नहीं की। मैं उससे नाराज नहीं था मैं तो उसको surprise देना चाहता था। अगले दिन में घर के लिए निकला। ट्रेन में बैठे बैठे मैं सोच रहा था कि अदिति मुझे देखते ही गले से लगा लेगी।

मै अपने station पहुंचा तो चाचा मुझे ख़ुद लेने आए थे। मैं घर पहुंचा कुछ ही देर में उस पार्क की तरफ चल दिया। मुझे पता था कि वो यहां हर शाम आया करती हैं।रास्ते में मैंने उसके लिए फूलों से भरी हुई गुलदस्ता भी लिया था।मैं पार्क में पहुंचा और इंतजार करने लगा। मैं बार बार घड़ी देखता बेसब्री से उसका इंतजार कर रहा था। लेकिन वह नहीं आई।फिर मैंने उसे फोन किया लेकिन फोन भी unreachable आ रहा था। मैं बेचैन सा होने लगा था। फिर मैंने पार्क के चौकीदार उसके बारे में पूछा और उसने जो मुझे बताया वो सुनकर मै सन्न रह गया।मेरे हाथों से फूल नीचे गिर गए।

उसने मुझे बताया था कि कल ही उसकी सड़क दुर्घटना में देहांत हो चुका। यह सुनते ही मैं दर्द के उस भंवर में फंस गया था जिससे मैं आज तक नहीं निकला। मेरे मन में अत्यंत दुख कई सवाल और कई अफसोस उबाल मार रहे थे। उसे आखरी बार नहीं देख पाने की बेचैनी के आखिरी समय तक उसे नाराज रहने का guilt, और उसे खोने का दुख मेरे जीवन में इतना घना अंधेरा लेकर आ गया था जिससे कोई भी चिराग मिटा नहीं सकती।

मैं उसके समाधि के पास जाकर बैठ गया और उससे बातें करने लगा फर्क सिर्फ इतना था पहले वह बोलती थी,मैं खामोश रहता था और आज सिर्फ मैं बोल रहा था और वह खामोश थी। और वो खामोशी मुझे उसके ना होने का एहसास कराती हैं।
बस इतनी सी थी ये कहानी।

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